चार अंतरे की कविता
चार अंतरे की कविता लिख,
सुबह फेसबुक
पर डाले थे,
पाँच पसंद अलार
मिले,
उसने तो बस दो
लाइन लिख,
अपनी छाया छाप
दिये थे,
और पसंद हजार
मिले |
मुखड़े का जो
आकर्षण है,
भरा शब्द में,
जिन बिंबो में
नव प्रतीक है,
धरा अब्द में,
पीड़ा भटक रही पटलों के,
फुटपाथों पर
पैदल-पैदल,
कहीं न विवरणकार
मिले,
इन्द्रधनुष का
झूल डालकर,
डोली में ले
जानेवाले,
उसको चार कहार
मिले |
टिप्पणियों की
खिली धूप की,
चहल पहल है,
बात-बात में इतर सुगंधित,
हवा-महल है,
शब्द व्यंजना मौन
खड़ी है,
हैं कनेर के, फूल झरे कुछ,
अनुभावों के
भाव तरंगित,
उसे डाल में
झूल रहे जो,
फूल गुलाबी गह-गह करते,
पथ-पथ हरसिंगार मिले |
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