एक रात की पीर
निकला चाँद निहार रही है,
एक रात की पीर |
प्रतिबंधों की
बंद गली में
झाँक रही है
आँख,
नये घोंसले
में सोया है,
जहाँ सदी का
पाँख.
और बदलता तेवर
अपना,
बेहद गरम समीर |
खिले, सरोवर के मुसकाये,
लाल रंग के
कंज,
जैसे मधुऋतु
आज कस रही
है पतझर पर
तंज,
जाड़ा खीँच रहा
है तन का,
दु:शासन सा चीर |
पुरवाई सँग
खेल रहे हैं,
खड़े बाँस के
पात,
खदक रहा है
नरम आँच में,
अन्तस्-कुँवरत-भात,
नृत्यमग्न है स्नेह-सिन्धु की,
चौपाटी का तीर |
पूरब की खिड़की
को खोलो,
हो सकती है
धूप,
अँधियारे के
घर आ जाये,
उगते रवि का
रूप,
समझे दुखी
हृदय की भाषा,
जनपथ वाला कीर |
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