कुछ हवा न बोली

कहा सुरभि ने सुनो !

चाल तुम चेतक की,

कुछ हवा न बोली |

 

इतनी बारिश हुई कि

ऋतु के भीग गए हैं बाल,

सूखे थे जो, उफने

जल से दरिया-पोखर-ताल,

खिली श्वेतता लिए   

पंखुड़ी कविका की,

कुछ जवा न बोली |

 

तारों के घर मंडित     

भू की आंगनबाड़ी नील,

हिंदी जन-समूह की   

भाषा, देवनागरी झील,

बादल गाते रहे 

गीतिका सावन की,

कुछ चवा न बोली |

 

दिशा-दिशा है तंग, 

हल का, मिला सही संकेत  

संकट में है चीन,

सशंकित संसर्गी साकेत,

कोरोना है एक

वायरस आतंकी,

कुछ दवा न बोली |   

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