तंग, शहर की लड़की
सरकारी नल पर
धोती है,
तन के मैले
कपड़े,
तंग, शहर की लड़की |
पढ़ने के दिन
खाली बैठी,
टूटा बिजली
खंभा,
मिले दुखों को
मार रही है,
वह साहस का
रंभा,
व्यंग्य
चुटीले डंक मारते,
अन्तस् फैले
लफड़े,
पंग, शहर की लड़की |
रोटी का है
गरम तवा भी,
जब तब होता
ठंडा,
जब देखो तब सीझ
न पाता,
मोटा चावल
खंडा,
निपट गरीबी
भाग लिखी है,
खाली थैले
पकड़े,
भंग, शहर की लड़की |
उभरे कई
सवालों के सँग,
घेरे में है
जीती,
यह अच्छा है, संकल्पक है,
जहर नहीं है
पीती,
आये हर संकट
से जूझी,
रह रह झेले, तगड़े
जंग, शहर की लड़की |
बहुत सुंदर सृजन आदरणीय
जवाब देंहटाएंआभार बन्धु
हटाएंअद्भुत
हटाएंसुन्दर
हटाएंबहुत ख़ूब
जवाब देंहटाएंआभार आदरणीय
हटाएंबहुत सुंदर
जवाब देंहटाएंआभार आदरणीय श्रीवास्तव जी
हटाएंइस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
जवाब देंहटाएंआभार बन्धु
हटाएंवाह बहुत सुंदर
जवाब देंहटाएंआभार भाई दहिया जी
हटाएंउत्कृष्ट आदरणीय।
जवाब देंहटाएंआभार बन्धु
हटाएंआभार भाई
जवाब देंहटाएंआभार बन्धु श्री
जवाब देंहटाएंबहुत सुंदर|
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