नवगीत, नई कविता का एक महानगर और गीत का छोटा सा गाँव है
हिंदी साहित्य के वर्तमान परिपेक्ष्य में नवगीत रचनाओं के नये क्षेत्र बहुत ही विस्तार लिए हुए हैं और भविष्य में भी लेंगे, जो नवगीत की मिट्टी के घर की नींव को पक्कापन देंगे और दीवारों को लीपकर उनका सौंदर्यीकरण लगातार करते रहेंगे | नवगीत की मंजुलता के आंगन में बैठा हर पंछी सदैव पंख फड़फड़ाता और खुले में रहनेवाले मयूर की तरह शब्द-नर्तन करता ही रहता है, सदैव करेगा | रचनाकार के शब्द और शब्दिता कभी किसी मंजूषा में कैद नहीं रह सकते | रचनाकार की वाणी सदैव नीर-क्षीर विवेकी होती है | यदि यह संभव नहीं होता तो साहित्य की स्वर-धारा का विलय कभी का एक सन्नाटे में हो गया होता | साहित्यकार को सत्ता के पास रहकर भी उसके गुण-दोष को सदा जाज्वल्यमान करते रहना चाहिए | उसका निष्पक्ष होना बहुत आवश्यक है | गीत, नवगीत के सोपान तक आते-आते कई रूपों और प्रारूपों में साहित्य के पन्नों और समाज के जनमानस में उछलकूद करता रहा है, उपस्थित रहा है | गीत पहले गीत नहीं था | यह स्वयं एक संगीत था, संगीत का एक राग था ‘ध्रुवा’, ध्रुवपद’, ‘ध्रुपद’ | संगीत के इस ‘ध्...