विकट और जनहीन जगह में

पेड़ों से कुछ दूर खड़ा है,

झुरमुट में वह बनजारा,

विकट और जनहीन जगह में |

 

खिसक रही हैं चुपके-चुपके,

रातें, कंबल ओढें,

सूरज संभव है भूला हो,

अपने गतिविधि-मोढ़ें ,

प्रेम-गीत आलाप रहा है,

वय-वृंदावन आवारा,

विकट और जनहीन जगह में |

 

पगडण्डी के आसपास हैं,

फूलों के चंडोले,

नदी किनारे कोयल के स्वर,

कुहू-कुहू रस घोले,

बाँस स्वयं बाँसुरी बजाते,

धुन-तुमड़ी का इकतारा,

विकट और जनहीन जगह में |

 

हेमकूट-शैलेय शिखर पर,

ध्यान-मग्न संन्यासी,

झरनों की लहरों में गुंजित,

झर-झर बारहमासी,

बैठ नीम तर छेड़ रहा है

ताल कहरवा, मछुआरा,

विकट और जनहीन जगह में |

 

स्वच्छ गगन है और बादलों

का है बिलकुल टोटा,

हुआ सबेरा चला नहाने,

राम-नाम का लोटा,

कहाँ छिपा है नीलगगन में,

ध्रुव-दर्शन का ध्रुवतारा,

विकट और जनहीन जगह में |

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